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महाराज जी ! भक्ति का ढोंग करते करते थक गया हूँ ! Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

Bhajan Marg · 16m · transcribed May 2026
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Transcript

Speaker 1

0:00 रमेश कुमार वर्मा जी जयपुर से गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि नमन महाराज जी जो मन विष्यों से ना मोड़ सके वो व्यक्ति का ढोंग रचाया। क्यों कह रहे हैं की जो मन विषयों से न मोड़ सके वो भक्ति का ढोंग रचाया क्यों रचाये क्यों है?

Speaker 2

0:17 नहीं, रचना चाहिए। पहले सुनो। ये गलत बात है। निराश होना या निंदा करना। अपनी या किसी की ये अध्यात्म नहीं सिखाता है। अध्यात्म सिखाता है की हम विषयों में फंसे निकाल नहीं सकते। लेकिन हम राधा राधा बोलेंगे कहरहे हैं

Speaker 1

0:37 की

Speaker 2

0:38 हमसे ढोंगी नहीं, उसे ढोंग क्यों कहोगे ऐसी बात नहीं करते। इससे क्या होगा की सद्भावना में निराशा आती रहेगी। हमारे यहाँ निराशा शब्द नहीं है, निराशा जगत के भोगों के लिए है। आशा जितनी दृढ़ होती चली जाएगी, ऐसा तुम्हे बोलना चाहिए न। हमारी भाषा गलत हो गई तो हमारा चिंतन गलत हो गया तो हमारा मार्ग रुक जाएगा। यह हम खुली बात कहते हैं। आप विषयों का त्याग नहीं कर सकते, कोई बात

Speaker 2

1:09 नहीं, आप पकड़ तो सकते हो। राधा राधा पकड़ो विषयों का त्याग नहीं कर सकते न। तो आप पहले पकड़ो राधा राधा, राधा, राधा राधा। यह आपको कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण ये आपको त्याग करवा देगा। आपके अन्दर सच्चाई आग। झूठी भक्ति का नाटक करने वाला भी 1 दिन सत्य मार्ग में चलने लगता है। झूठा खेले साचा हो। जो कोई भक्ति करे कपट से, उसको भी अपनाओ साम दाम और दंड भेद से सीधे

Speaker 2

1:39 रास्ते लाऊं नकली सी बनाऊं। असली। यही तो मेरे मन में ठानी भगत, मेरे मुकुट माने, भगवान का स्वभाव, भगवान का प्रभाव। यह याद रखो। अपने को भूलो, अपने को भूलो। मैं किसी योग्य नहीं हूँ। सच्ची बात हम तुम सब 1 लाइन में खड़े है। मेरे प्रभु की कृपा है जो हम बोल रहे हैं। आप सुन रहे हो, गा रहे हो, नाम चिंतन, भगवत मार्ग नहीं माया। भगवती का ऐसा ही फिसलन है। यहाँ कोई महान नहीं है,

Speaker 2

2:09 कोई छोटा नहीं, सब उसी महान के है। जो जितना भगवत कृपा का पान करता जाता है, उतना ही वो महान होता जाता है। जो कृपा की अवहेलना करता जाता है, वही पतित होता चला जाता है। पहला शब्द हमारे ऊपर बहुत कृपा है। हमें मानव देव, मिला, साधु, संग, मिला नाम जब हो रहा है, ये प्रमाण है। दूसरी बात प्रभु के अनुकूल नहीं चल पा रहा हूँ। यह बात सदैव 1 से 1 बड़े महान में रहती है।

Speaker 2

2:35 ध्यान रखना पर हमारे ऊपर बहुत भगवान की कृपा है। तो कृपा जोरदार होगी की हमारी नीचता जोरदार होगी कृपा है। सोना बिगारन को तो सोना संवारण को तो मुई परी हो, कौन हो जीते कौन दोहरे पर बदी न। तो तुम्हारी माया बादी, पसारी, विचित्र, सुर्मणमोहेकाकी को हरिदास। हे हरी तुम्हारे हम जीते, तऊ न तोड़ तऊ न। तो फिर भी इतने कृपाल हो की आप बनाते बनाते हार

Speaker 2

3:05 गए और मैं बिगड़ते बिगड़ते जीत रहा हूँ। फिर भी आप मुझे बचा रहे है कितने कृपालु हैं आप? आपकी कितनी करुणा है। हम बिगड़ते बिगड़ते जीत गए और आप बलाते बलाते हार रहे हैं, फिर भी आप हार नहीं मान रहे और मेरे उद्धार के लिए कृपा कर रहे हैं। ऐसे प्रभु के मैं हूँ तो हम ऐसा नहीं बोलते। अगर कोई नाटकबाजी भी करे राधा, राधा, कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण। तो ये तो नाटक नहीं न। यह सत्य है

Speaker 2

3:32 न। 1 दिन उसका कल्याण कर देगा, 1 दिन उसका पुत्र के बहाने से बोला नारायण तो भगवत प्राप्ति हो गयी। वो धन के लिए राधा राधा बोल रहा है, भूख के लिए बोल रहा है या किसी वस्तु के लिए बोल रहा है। तो भोग वस्तु में 1 राधा नाम की कीमत है। क्या? उसका कल्याण तो हो ही जायेगा। चाहे भाव कुभाव अनखआलशह नाम जपत मंगल दिसि। 10 शरणागति

Speaker 2

4:03 भगवान की होकर नाम करो, बिल्कुल, चिंता मत करो। जब अपना घर किसी के नाम करते हैं तो उसका जाना, उसकी कड़ी, उसकी छिपकिली, ये सब उसी के नाम हो जाती है। हमारा काम, हमारा क्रोध, हमारा लोभ, हमारा मुंह, सब कुछ उन्हीं के हवाले नहीं की। शरण में जानो, जिस ठीक कर दोगे। आप संभाल लोगे, ऐसे ऐसे चलो भगवान के हो। वो भगवान। 1 क्षण में जब कृपा का संकल्प होगा, उसी क्षण महात्मा बन जाओगे।

Speaker 2

4:33 आप दुराचारों भजते, माम, अन भाग, साधु, समत्या समयक्ता जिसने निश्चय कर लिया, मुझे नीच का तो 1 मात्र श्री कृष्ण ही हैं, दूसरा कोई आश्चर्य नहीं। भगवान कहते हैं साधु समान में से साधु भगवान के पास असीम सामर्थ, घोर, पापी को ब्रह्मऋषि बना सकते है। महात्मा बना मुकमकरुतिवाचालम यत कृपा मंदिर परमानंद माधव कर, तुम कर, तुम मान्यता कर। तुम ऐसे

Speaker 2

5:03 भगवान के सेवक हो के उनके अंश होकर उनके दास हो के हमें चिंता नहीं। नीच हूँ, पर भगवान का हूँ, पतित हूँ पर पतित पावन प्रभु का हूँ। हम ये नहीं कहते। हम जीतेंद्र है बहुत ब्रतधारी, बहुत नीच हैं, पर भगवान के हैं। इसमें न भगवान काट सकते हैं और न कोई काट सकता है। हम भगवान के अंश से इसमे कौन काट सकता है। वो खुद बोले ममईवांसोजीवलोके जीव, हमारी गलती है कि हम भगवान को अपना

Speaker 2

5:29 ने, जिस दिन से आप भगवान को अपना मानने लगेंगे, उसी दिन से मंगल शुरू हो जायेगा। मंगल भवन का मंगल विधान चालू हो जायेगा। सब नाटक खत्म कर देंगे और सत्य में रोने लगोगे। कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण क्यूँ क्यूँ की भगवान की कृपा ही इस मार्ग में आगे जीव को अगर उनकी कृपा न हो तो सब नाटक में बदल जाए। 1 मिनट में बदल जाए। इतने बड़े अवतारी महापुरुष नारद जी जरा सा आया, काम विजय तो कैसा

Speaker 2

5:57 नाटक शुरू हो गया, के तैयार हो गया तो तुम क्या नाटक में उतर दे। और अगर कृपा हो जाए। तो जो राम नहीं बोल पा रहे थे, मारा बोले, वो ब्रह्म ऋषि हो गए। भगवान की कृपा, भगवान का बल सबसे बड़ा भाई, ऐसा कभी निराशा भरे। शब्द मत बोलो नहीं है। हमारी आशा, आशा बद्धासमुतकंठानाम, गाने, सदा रुचि। आशा इसी जन्म में भगवान मिलेंगे। मैं बहुत नीच हूँ, पर भगवान की बड़ी कृपा हम

Speaker 2

6:27 पर है। राधा राधा, कृष्ण, कृष्ण प्रभु का नाम जप कर रहे हैं। इससे ज्यादा है। जो प्रभु ने कहा वो हम नहीं कर पा रहे। हम जितेंद्र हो जाए, हम पवित्र, हमारे गंदे आचरण, लेकिन कब तक रहेंगे। अब भगवान का नाम पधार चूका है। हमारी जिव्या पर मंगल हो जाएगा, विश्वास कर लीजिये, परम मंगल हो जाएगा। भगवान का नाम सर्वसामरतशालीजितने भी ऊँचे उठे, इस प्रपंच से नाम जापक उठे। नाम पर ध्यान दीजिये, अपने आरोप नहीं, भगवान

Speaker 2

6:58 पर ध्यान दीजिये, अपने पर नहीं, अपने पर ध्यान देंगे तो निराशा ही भगवान पर ध्यान देंगे तो आनंदित हो जायेंगे। 11 इंद्री जो चाहती है वो कर लेती है तो ईमानदार बोल रहे। इसलिए सभा में बोल पा रहे हो। अगर बेईमानी से बोला जाए तो बातें फराटीदारभलेबोले। हर इन्द्र अपना काम जोर से करा लेती है। आप ईमानदार आदमी तो आप अपनी हृदय की स्थिति को देख कर कह रहे हैं की मैं कर रहा हूँ, नहीं तो

Speaker 2

7:24 प्राय भगवत कृपा ही संभालती है। नहीं तो बहुत बहुत विचित्र है। अति प्रबल देव तो माया छूटे हिरा करो। जब देवी हिषागुणमईममाय निराश नहीं आशा करो भगवान की कृपा की, भगवान के बल का चिंतन करो तभी आनंद का अनुभव होगा। आप पर विशेष कृपा है? जब हम कह रहे हैं तो आप मान लो। आज से विशेष कृपा है। ये भागवत पुरुष के लक्षण

Speaker 2

7:54 होते हैं। जो अपनी कमियों से घुटता है और संतों के सामने, गुरुजनों के सामने कहता है की सत्यता मेरे में नहीं है। यह वास्तविक भगवान के कृपा पात्र में ही भाव आता है। नहीं तो कहीं न कहीं छोटी मोटी अगर भक्ति बन जाती तो अहंकार हो जाता है की हम भगत हैं। और यह बात बड़े महा पुरुषों में भी आती है। वो क्या कह रहे हैं? मौसम कौन कुटिल खल कामी कितने दुष्षीदाजीकहरहे है जो मैं अपने

Speaker 2

8:23 अवगुण कहाँ हूँ, बाढ़ कथा पर ले जाओ और देखो कितने बड़े भगवत प्राप्त महापुरुष है। ज्ञान, बैराग, भक्ति, प्रेम सबको अवगाहन की स्वामी जी है, महाराज है, जितने बड़े बड़े महाभागवत है। जब अपनी तरफ देखा जाता है तो ऐसा ही अनुभव होता है। जब प्रभु की तरफ देखते है तो नाचते हुए छाती चौड़ी करके चलते है। हमारे प्रभु, वैसे तो हम नीच है, हमारे प्रभु हो। कहावत? सबका राम सेहत उपहास स्वामी सीता सो सेवक तुलसी

Speaker 2

8:54 दास। अब तो बन गयी तो सब भी कहते है की तुलसी सी राम को, मैं भी कहता हूँ, सी आई राम का आरोप कहा सी राम। मैं तो बात बन गई, क्यूकी मैं दास से युक्त हो गया। लोग भी लोग भी कहते है की तुलसी राम का दास तो आप स्वामी अपनी इज्जत संभाले, मैं उनका सेवक हूँ वो संभाल लेंगे बहुत मस्ती में रहना चाहिए। मस्ती का मतलब भगवत आनंद में कितनी कृपा हम पर भगवान की

Speaker 2

9:21 है, हमें देखो कंठी तिलक लगाओ आप भगवान के आश्रित हो, आपको दन्ता में ठीक है, लेकिन अन्दर ऐसी नहीं स्वीकार कर। मैं प्रभु का हूँ अच्छा लोहा। कभी आभूषण बन करके थोड़ी कानों और गले में आ सकता है। लेकिन पारस मणि का चमत्कार छू गया तो सोना हो गया तो आभूषण बन गया। ऐसे लोग को भगवत दास प्राप्त अधिकारी थोड़ी। लेकिन भगवान की गुरुदेव की कृपा हो गयी। और कृपा रूपी पारस मणि ने भगवान

Speaker 2

9:52 की सेवा का पात्र बना दिया। हम भाव देश में कोई सखा है, कोई सखी है, कोई गोपी है, कोई दास है। अपने अपने स्वामी की सेवा में रद्द है। ये भगवत कृपा तो कृपा को समझिए और इधर उधर मत चिंतन कीजिये और अन्दर से तो बना ही रहे। जो आपके अन्दर है की मैं बहुत नीच हूँ, पर हमारे ऊपर कृपा तुरंत ये बोलिये नीच तो हूँ, पर हम पर कृपा है, देखो हनुमान जी महाराज असमयधमसखासुनरतत्काल लिखे,

Speaker 2

10:19 मोह पर रघुवीर, दोनों बातों पर ध्यान दीजिये। मैं क्या हूँ, असमय 7 आरोप, तत्काल उत्तर देखिये, पर मोहू पर रगवीर। इतने कृपालु भगवान हम पर है। ये भक्त का बचन के अंतर्गत होना चाहिए, केवल इतना कह के नहीं। छोड़ देना चाहिए की मैं बहुत नीच हूँ, मैं बहुत नीच हूँ, पर हम पर बहुत कृपा है। अगर बहुत कृपा वाला शब्द न बोले तो हम अपने प्रभु का 1 तरह से अपमान कर रहे हैं। हाँ बस ये

Speaker 2

10:48 शब्द बोलना जरूरी था।

Speaker 1

10:50 तो उसमे जो बोला इसमें इसमें जैसे आप कहते हैं कि प्रभु, तो उसका क्या है। जैसे की तुलसी राज्य, हार चुका हूँ, बार बार मेरे को माया गिरा देती है।

Speaker 2

11:03 इस वर्जन का क्या, इसमें साधक का प्रयास जब होता है न, तो जब तक हम कुछ कर सकते हैं, ऐसी भावना होती है। तो मूढ़ता छुपी रहती है, अहंकार में करता है, मैं कर सकता हूँ। ऐसी जब तक भावना रहती है तो अहम रहता है, मुड़ता रहती है तो उसको परास्त होना पड़ता है। जब गिरता हो, आंतरिक विषय है सबका बाहरी, तो शुक्ल पक्ष की जीवनी लिखी जाती है।

Speaker 2

11:33 किसी की भी जीवनी लिखी जाए तो शुक्ल पक्ष की लिखी जाएगी, कृष्ण पक्ष की नहीं, कृष्ण पक्ष की। तो जाने मोरी छाती है न। तो जब वो पास देखता, ऐसे घुटने टेके और फिर देखा ऐसे खड़ा, उसको लगा। मैं तो घुटने टेक दिया था। मुझे खड़ा कौन किया भगवान ने? तो वो हाथ उठा कहता है मैं हर तरह से हार गया हूँ, प्रभु आप ही आप ही देखो, आप ही देखो हर साधक की, हर संत की,

Speaker 2

12:00 हर माह पुरुष की अनुभूति होती है। माया पर हमारी विजय नहीं, हमारे प्रभु ने विजय दिलाई है। तो उसी मन को कहे की मेरा मन ह न जाए। मैं बार बार इसे समझाता हूँ, पर इंद्रियों के साथी भोगों में विचरण प्रभु हार गया। तुम संभाल लो जो भगवान आदेश कर रहे है, मन बुद्धि है, मैं नहीं लगा पा रहा हूँ। तो क्या करें? मन को, प्रभु को दे 2 साल यह मन आपका है। तो

Speaker 2

12:30 मन भगवत स्वरूप है। इंद्रिया मनुष्य शासी। जिस समय भगवान की शरणागति में मन समर्पित हुआ तो कृष्ण सीधे प्रभु के चरणों में पहुँच जायेगा। भगवत स्वरूप भी है और माया स्वरूप भी है। जब तक अहम रहता है, तब तक माया स्वरूप है। अहम गलित हुआ कि भगवत स्वरूप हो जाता है। तो अहम गलित का यह वचन है कि हार मैं हार गया, अब ये आम गया। प्रभु के चरणों

Speaker 2

13:02 विविध प्रकार से जतन करके देखा, मन नहीं टिक रहा। रघुनाथ जी, तुलसीदास प्रभु पर आप अपने इस मन को संभाल, मैं आपके चरणों में समर्पित कर दिया, वे डांट लो, ठीक कर ले। भगवान का नाम मन चोर है, अपने अहंकार रहित भक्तों के मन को चुरा लेते हैं, मन को अपने में लीन कर लेते है। तो ये अहम समर्पित भक्त

Speaker 2

13:32 का हृदय ऐसे समर्पित होता है महापुरुष जन हमको कह के और कर के बता रहे हैं। तुलसी दास जी की जो स्थिति है, वो रामाकार है। वो स्थिति भी बता रहे हैं। जड़चेतन जीव जत सकल राम में जान कितनी ऊँची स्थिति है। जो भगवान कह रहे है की बहु जन्मनावंतेज्ञान देव, श्रमित महात्मा दुर्वा महात्मा है, दुर्लभ में वो खुद अपनी स्थिति बता रहे है। चेतन

Speaker 2

14:03 जीव जत सकल राम में जान। ऐसे महापुरुष का अब कोई मन रह गया है, क्या? आरोप वो अपने लोगों के कि तुम हार जाओ। न तो मन ठाकुर जी संभाल लेंगे। पर अहंकारी हारता नहीं है। मैं यह कर लूंगा, मैंने यह किया मैं में, साधन में साधन। और जब दयन्यताआतीहै तो अपने साधन पक्ष का गुणगान नहीं होता, अपने दोस्तों का गुणगान होता, भगवान की कृपा का गुणगान होता है। साधन पक्ष तो गुरु कृपा से चल रहा

Speaker 2

14:31 है, भगवान की कृपा से चल रहा है। कभी साधन पक्ष का महा पुरुषों के द्वारा गुण है, कभी अपने निजी जनों को तो बता सकते हैं की देखो उस अवस्था में ऐसे ऐसे कष्ट प्रति साधन करते हुए, ऐसे आगे वो उनकी शिक्षा के लिए, न की आम पोषण के लिए। तो आप दैन्य भाव से भगवान की शरण में रहते हुए खूब नाम जप करो और उसको ऐसे शब्दों से न बोलो। हाँ, हम कमी जो है, वो

Speaker 2

14:55 प्रभु जानते हैं। वो जब आप में भारी कमी थी, तब आपको स्वीकार कर लिया। अब तो आप अपनी कमियों को जानने लगे हैं। तो आप सोचो प्रभु ने कब खींचा था? जब आपको बिल्कुल ज्ञान नहीं था, तब खींचा था। अब तो आप जानने लगे हैं। तो हम अंदर से तो जरूर ऐसा रखे, लेकिन बाहर से यदि हम ऐसा बोलेंगे तो हमारे प्रभु की शरणागति पर दोष आ जाएगा की कंठी तिलक धारण के हुए खुद कह रहे

Speaker 2

15:21 हैं। ढोंग। तो सबको तो आपको समझेगा नहीं, वो भगवान की महिमा पर विचार करने लगे। यार ये लोग इतना कह रहे हैं, ढोंग शुरू करेंगे तो ढोंग होगा। ढोंग का फल क्या होगा? लोग निंदा करते हैं, ढोंग की नहीं, ढोंग नहीं। अगर, राम, कृष्ण, हरि बोल रहे हैं। यह सत्य है। पर हमारे अन्दर भी वो स्थिति नहीं है जो संतो में होनी चाहिए। हम हर संत से यही बात सुना है। भजन तो कर रहा हूँ, पर

Speaker 2

15:47 वो भजन नहीं है जो होना चाहिए। ये बड़े बड़े संतों से सुना है। क्या है भजन का स्वरूप? उनके हृदय में कितनी भूख है। भजन की संतों के अनुभूति होती दैन्यता में, न कि कोई उनको दोषी मान ले। संत जब अपने को बोलते है, न मैं हूँ मैं, नीच हूँ। ये उनकी दैन्यता, यह दरबार दिन को स चले थोड़ी होते हैं मौसम कौन, कुटिल, खल, कामी। और जब पद उच्चारण करते तो ठाकुर जी बैठ कर सुनते

Speaker 2

16:15 हैं। ऐसे ही कुटिल होते हैं कहीं कमी होते है अच्छा हो रहे शरीर आँखों से, बाहर से कुछ दिखता नहीं, वो काम हो सकते हैं और वो लिख रहे हैं मौसम कौन, कुटिल, खल, कामी। जिन को भजन हे भगवान, कितने देना इन महा पुरुषों में यह बात समझनी चाहिए जी।

Summary

The discussion revolves around the nature of devotion and the importance of sincerity in spiritual practice. The speakers emphasize that true spirituality does not condone despair or criticism and that even those who engage in superficial devotion can eventually find their way to genuine faith through the grace of God.

- True spirituality teaches us to rise above despair and not to criticize ourselves or others.
- One cannot completely renounce worldly desires, but can focus on chanting divine names like "Radha Radha" to cultivate a deeper connection with God.
- Even insincere devotion can lead to genuine spiritual awakening over time.
- The importance of humility and recognizing one's own shortcomings is emphasized as a pathway to divine grace.
- The speakers stress that God's grace is essential for overcoming personal flaws and achieving spiritual growth.
- Devotees should focus on God's qualities and not dwell on their own inadequacies to avoid despair.
- The narrative highlights that everyone is equal in the eyes of God, and true greatness comes from divine grace rather than personal achievements.
- The discussion encourages a mindset of hope and faith in God's mercy, regardless of one's current state.
© transcribe · For agents Built with care and craft by Gokul Rajaram