Transcript
0:00 जुलाई 2021, शेयर बाजार में 1 अजीब सी हलचल थी।
0:04 उस वक्त माहौल ही कुछ ऐसा था
0:07 बिल्कुल मतलब जोमैटो अपना ई पी रहा था। और ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया की नजरें उनके वैलुएशन पर टिकी हूँ।
0:13 1 लाख करोड़ रूपए की कंपनी, 1
0:16 लाख करोड़ न्यूज़ चैनल्स पर हर तरफ बस वो, लाल रंग का लोगो और डिलीवरी बैग्स की तस्वीरें फ्लैश हो रही थी। सही बात है, मतलब भारतीय स्टार्ट अप इको सिस्टम के लिए ये 1 ऐसा पल था जैसे जैसे किसी सस्पेंस फिल्म का एकदम परफेक्ट क्लाइमेक्स चल रहा है,
0:32 जहाँ हर जीत जाता है और तालियां बज रही होती है।
0:35 एग्जैक्ट ली। लेकिन देखिये, आज हमारी इस चर्चा में हम उस 1 लाख करोड़ के आंकड़े या उस शानदार क्लाइमेक्स के बारे में बात नहीं करने वाले है। आज के इस डीप डाइव का हमारा मिशन कुछ और ही है।
0:46 क्योंकि जब हम किसी बड़ी उपलब्धि को सिर्फ बाहर से देखते हैं न तो वो बहुत साफ़ और व्यवस्थित लगती है।
0:52 हाँ, एकदम परफेक्ट लगती है।
0:54 हम केवल उस पल को सेलिब्रेट करते हैं जब सब कुछ चमक रहा होता है। लेकिन उस चमक के पीछे की जो
0:59 अव्यवस्था है, जो रातों की नींद उड़ी है, है।
1:03 और जो मानसिक संघर्ष हुए हैं, हम उन्हें पूरी तरह से इग्नोर कर देते हैं।
1:07 और इसी लिए न मेघा विश्वनाथ की जो किताब है, अनसीन दी, अनटोल्ड स्टोरी ऑफ दीपिंदर, गोयल एंड द मेकिंग ऑफ़ जमैटो, जिसकी ऑडियो बुक समरी। आज हमारे इस डीप डाइव का आधार है, वो मुझे इतनी दिलचस्प लगी, क्योंकि
1:21 ये कोई आम केस स्टडी नहीं है, बिल्कुल नहीं।
1:24 ये कोई टिपिकल कॉर्पोरेट केस स्टडी नहीं है, जहाँ सिर्फ ग्राफ और रेवेन्यू मॉडल समझाए गए हैं। यह उस अनदेखी कीमत और 1 फाउंडर के माइंडसेट की कहानी है। सही कहा हम आज बात करेंगे पंजाब के 1 छोटे से शहर से निकले उस लड़के की जिसने मतलब हमारे खाना ऑर्डर करने के तरीके को भी पूरी तरह से बदल दिया।
1:42 देखिये इस किताब की सबसे खास बात ये है की ये सफलता का महिमा मंडन नहीं करती है। यह उन अनिश्चितताओं को सामने लाती है जिनका सामना किसी भी बड़े विजन को सच करने में होता है। इस चर्चा से हम केवल यह नहीं समझेंगे कि 1 बिलियन डॉलर कंपनी कैसे बनती है, बल्कि हम यह भी रिकॉर्ड करेंगे की भारी दबाव के बीच 1 इंसान फैसले कैसे लेता है।
2:03 और ये सफलता का वो पैमाना जो दुनिया हमें दिखाती है, वो सच में हमारे लिए सही है भी या नहीं। तो चलिए इस कहानी को एकदम शुरुआत से पकड़ते हैं। चलिए जुलाई 2021 के उस शोर शराबे वाले आई पी ओ से सीधा फ्लैशबैक में चलते हैं। पंजाब के 1 छोटे से शहर में किताब के शुरुआती हिस्सों में 1 बहुत ही हैरान करने वाली डीटेल है। मतलब दीपिंदर गोयल को बचपन में हकलाने की समस्या थी है।
2:31 यह बहुत कम लोग जानते हैं।
2:32 अब जब हम 1 ऐसे इंसान को देखते हैं जो आज हजारों लोगों की टीम चला रहा है, इन्वेस्टर्स के सामने करोड़ो की बेच दे रहा है तो
2:39 ये मैजिन करना मुश्किल होता है, बहुत मुश्किल होता है।
2:42 लेकिन यहाँ मेरा 1 डाउट है। आज कल हर स्टार्ट अप या सक्सेस स्टोरी में 1 ट्रेंड सा बन गया है। कैसा ट्रेंड वही 1 ट्रैजिक बैक स्टोरी दिखाने का। तो मैं ये सोच रही थी की क्या सच में बचपन की ऐसी कमजोरियां जैसे कॉन्फिडेंस की कमी, आगे चलकर 1 अरबो डॉलर की कंपनी बनाने के लिए कोई स सुपर पॉवर बन जाती है।
3:03 अच्छा मतलब आप पूछ रही है की
3:05 है या फिर ये सिर्फ कहानी को ड्रमैटिक बनाने का 1 तरीका है।
3:09 यह बहुत ही वैलेट सवाल है। देखिये कोई भी कमजोरी अपने आप में कोई सुपर पावर नहीं होती लेकिन जो चीज मायने रखती है वो है अडाप्टेशन या परिस्तिथियों के हिसाब से खुद को डालने की प्रक्रिया। अच्छा यहाँ जो बात सबसे हैरान करने वाली है वो ये है की किताब बहुत ही सूक्ष्म तरीके से यह समझाती है की इंसान की शुरुआती परिस्थितियां उसकी अंतिम सीमा तय नहीं करती मतलब वो
3:31 उसे रोकती ही नहीं है।
3:32 बिल्कुल जब किसी बच्चे को बोलने में संघर्ष करना पड़ता है तो वो अक्सर अपने आस पास की दुनिया को बहुत गहराई से ऑब्जर्व करना शुरू कर देता है।
3:39 हाँ वो लोगो को नोटिस करने लगता है।
3:42 वो ये समझने लगता है की लोग कैसे रिएक्ट करते हैं। और सबसे बड़ी बात वो आलोचनाओं और मजाक को सहनी की 1 थिक स्किन या मोटी चमडी विकसित कर लेता है।
3:52 अच्छा मतलब आप कह रहे है की वो बचपन का संघर्ष अनजाने में उन मानसिक मासपेशियों को मजबूत कर रहा था जिनकी जरुरत आगे चलकर बोडरुम पड़ने वाली थी।
4:03 बिल्कुल हर दमी चुनौती अलग होती है, किसी की चुनौती आर्थिक होती है तो किसी की सामाजिक है। महत्वपूर्ण यह नहीं है की चुनौती क्या थी, बल्कि यह है की समय के साथ उस इंसान ने खुद को कैसे इंवॉल्व किया। सही बात है जब हम किसी सफल व्यक्ति को आज देखते है तो हमें लगता है की वो हमेशा से ऐसा ही था। लेकिन उसके बड़े फैसले लेने का तरीका, रिस्क, उठाने की क्षमता, वो सब शुरुआती
4:28 सालों की ही देन होती है।
4:29 न एकदम सही वो बचपन का संघर्ष 1 ऐसा साइकोलॉजिकल बेस बना देता है जो बाद में बड़े झटकों को सहने का काम आता है।
4:37 वाह ये बड़ी दिलचस्प बात है कि जो हमारा फाउंडेशन है वो सिर्फ स्किल से नहीं बल्कि सर्वाइवल इंस्टंट सी बनता है।
4:44 बिल्कुल।
4:45 लेकिन चलिए इस व्यक्तिगत संघर्ष से थोड़ा आगे बढ़ते है और बिजनेस की दुनिया में आते हैं। है। चलिए 1 आइडिया होना 1 बात है लेकिन उसे 1 वास्तविक बिजनेस में बदलना
4:54 बिल्कुल अलग खेल है, बहुत अलग।
4:57 अक्सर न बाहर से लोगो को लगता है की फूड टेक बिजनेस क्या है, बस कुछ कोडिंग करो, 1 बढ़िया सा
5:01 आप बनाओ रेस्टरां की लिस्ट डालो और हो क्या?
5:03 हाँ बस इतना ही। लेकिन ऑडियो बुक सुनते हुए। मुझे जो बात सबसे ज्यादा हिट की वो ये थी की ये बिजनेस 1 पहिए वाली साइकिल मतलब यूनी साईकल चलाने
5:14 जैसा है और वो भी आसान नहीं है।
5:17 अरे सिर्फ यूनी साईकिल चलाना नहीं बल्कि उस पर बैठकर आग की लपटों के साथ जगलिंग करना है।
5:22 वो नालेज एकदम सटीक है। देखिए फूड डिलीवरी केवल 1 टेक प्रोब्लम नहीं है, ये बहुत ही जटिल ऑपरेशन प्रॉब्लम है। इसमें मुख्य रूप से 3 स्टेक होल्डर होते है, ग्राहक, रेस्तरां और डिलीवरी पार्टनर है। और इन तीनों के हित ना अक्सर 1 दूसरे से टकराते हैं।
5:39 इसी बात को थोड़ा और खोलते हैं। क्यूंकि ये सिर्फ जोमैटो की बात नहीं है? ये किसी भी प्लेटफार्म बिजनेस का सच है। बिल्कुल मतलब अगर मुझे ग्राहक के तौर पर आप पर 50 परसेंट का डिस्काउंट दिखता है तो मैं तो बहुत खुश
5:52 हूँ, हर कोई खुश होगा।
5:53 लेकिन वो पैसा कहीं से तो आ रहा है न, या तो रेस्टरां मार्जिन काट रहा है या फिर कंपनी अपने इन्वेस्टर्स का कैश बंद कर रही है सही का। और अगर आप डिलीवरी पार्टनर को ज्यादा पैसा देना चाहते हैं तो आपको ग्राहक से डिलीवरी फीस बढ़ानी पड़ेगी जिससे ग्राहक
6:08 नाराज हो कर आप बंद कर देगा।
6:09 एग्जैक्ट ली। तो इस सब के बीच कंपनी की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी कैसे मेंटेन होती है। जब मैंने इनके शुरुआती सालों के बारे में पढ़ा तो उन्होंने करोड़ो रूपए का कैश बंद किया। बाहर से देखने पर ये किसी कैलकुलेटेड रिस्क के बजाय अन्दा धुन जुआ ज्यादा लगता है। अच्छा तो मैं ये सोच रही थी की क्या 1 बड़ा बिजनेस बनाने के लिए हमेशा हर चीज को दांव पर लगाना जरूरी है। 1 समझदारी भरे जोखिम और लापरवाही में क्या
6:36 फर्क है।
6:37 यही वो जगह है जहाँ 1 आम इंसान की सोच और 1 फाउंडर की सोच में सबसे बड़ा जिंदा हता है। कैसे हम अपनी आम जिंदगी में स्थिरता चाहते हैं? 1 सुरक्षित नौकरी हर महीने की पक्की सैलरी है, वो तो है लेकिन उद्यमिता यानि आंटरपरनोशिपस्थिरता के बिल्कुल उलट है। अच्छा जब आप कोई नया मार्केट बना रहे होते है। और याद रखिये जोमैटो सिर्फ फूड डिलीवरी नहीं कर रहा था वो भारतीयों को घर पर ऑनलाइन खाना मंगाने की
7:04 आदत डलवा रहा था।
7:05 हाँ यह 1 बिहेवियरल चेंज था तो
7:08 उसमें भारी जोखिम लेना ही पड़ता है। लेकिन उसे अंदर धुन जुआ कहना गलत होगा।
7:13 तो फिर कैलकुलेटर रिस्क क्या होता है। क्योंकि पैसे तो यार पानी की तरह बह रहे थे। न।
7:17 देखिये कैलकुलेटर रिस्क का मतलब ये नहीं है की आपको कभी नुकसान नहीं होगा या आप फेल नहीं होंगे। इसका मतलब है असफलता की कीमत को पहले से तय कर लेना। अच्छा जब कंपनी भारी डिस्काउंट दे रही थी तो असल में कस्टमर एक्विजेशन कॉस्ट जिसे सी ए सी कहते हैं, यानि 1 नया ग्राहक जोड़ने की कीमत चुका रही थी।
7:36 ओके, तो वो 1 तरह की इन्वेस्टमेंट थी।
7:38 हाँ उनका कैलकुलेशन ये था की अगर हम आज इस ग्राहक को आदत डलवा दे तो आने वाले सालों में हमसे इतनी बार खाना मंगाएगा की ये शुरुआती नुकसान मुनाफे में बदल जाएगा।
7:48 मतलब ये लोंग टम गेम था, बिल्कुल
7:51 समझदारी भरा जोखिम वो है जहाँ आप डेटा देखते है, 1 परिकल्पना बनाते हैं, उस पर दांव लगाते हैं और अगर
7:57 वो काम नहीं करती तो तो आप
7:59 बहुत तेजी से अपनी रणनीति बदल लेते है। जैसे जोमैटो ने बीच में कई नए फीचर्स और बिजनेस मॉडल स्ट्राइक किया और बंद भी की है।
8:06 हाँ, मैंने भी कई फीचर्स देखे जो
8:07 आप नहीं हैं तो जुआरी उम्मीद पर दाव लगाता है लेकिन 1 अच्छा फाउंडर डेटा और फीडबैक लूप पर दाव लगाता है।
8:15 वाह मतलब ये कि बिना सोचे समझे छलांग लगाना बेवकूफी है। लेकिन यह जानकर छलांग लगाना की नीचे गद्दा कहाँ रखा है और अगर गिरे तो उठना कैसे।
8:26 वो असल रिस्क लेना है, बिल्कुल है।
8:29 लेकिन यहाँ बात सिर्फ कंपनी के पैसों की नहीं है। मुझे लगता है कि जब 1 फाउंडर कोई निर्णय लेता है तो दाव पर सिर्फ इनवेस्टर्स का पैसा नहीं होता और क्या होता है उस इंसान की पूरी पहचान, उसका इगो उसके सपने दाव पर होता है। यह तो है कुस फैसले का जो इमोशनल या भावनात्मक दबाव होता है न वो शायद बाहर वालों को कभी समझ नहीं आ सकता।
8:51 आप बिल्कुल सही कह रही है और ये किताब के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से 1 है। निर्णय लेने की प्रक्रिया या डिसिजन मेकिंग। जब आप अपनी कंपनी चला रहे होते हैं तो हर फैसला आपका अपना रिफ्लेक्शन बन जाता है।
9:04 हाँ और यहाँ पर बात बहुत दिलचस्प हो जाती है। मुझे ऑडियो बुक का वो हिस्सा याद आ रहा है जो मुझे बहुत पावरफुल लगा। कौन सा ये बताता है की किसी फैसले का सही या गलत होना केवल उसके नतीजों से तय नहीं होता। यह बात थोड़ी अजीब लगती है क्योंकि हम तो उसी दुनिया में रहते हैं जो सिर्फ रिजल्ट देखती है। बिल्कुल इसे मैं 1 अनालाजी ऐसे समझाती हूँ मान लीजिए क्रिकेट का मैदान है अच्छा ठीक
9:29 है। 1 बैट्समैन ने गेंद की पिच देखी लाइन और लें समझ। उसका फुटवर्क 1 दम परफेक्ट था और उसने 1 बहुत ही शानदार शॉट खेला।
9:39 तकनीक के हिसाब से बहुत बढ़िया शॉर्ट है।
9:42 तकनीक के हिसाब से वो शॉट छक्का होना चाहिए था। लेकिन तभी अचानक हवा का रुख बदल गया या बाउंडरी पर खड़े फील्डर ने हवा में छलांग लगाकर 1 असंभव सा कैच पकड़ लिया। बैट्समैन आउट हो गया और स्कोर बोर्ड पर। वही तो अब स्कोर बोर्ड सिर्फ। यह दिखाया की वो जीरो पर आउट हुआ। लेकिन क्या उस बैट्समैन का फैसला गलत था।
10:02 यह 1 बहुत ही बेहतरीन नोलॉजी है और दुर्भाग्य से न हमारी कॉरपोरेट दुनिया और समाज सिर्फ स्कोर बोर्ड देखते हैं। बिल्कुल किताब इस बात पर जोर देती है कि भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है। 1 बिजनेस लीडर के पास कभी भी सौ परसेंट जानकारी नहीं होती है, वो
10:19 पॉसिबल ही नहीं है।
10:20 कई बार आप एकदम सही, डेटा, बेहतरीन, रिसर्च और लॉजिक के साथ 1 फैसला लेते हैं। लेकिन बाजार के हालात बदल जाते हैं।
10:27 जैसे जैसे कोई महामारी आ जाए, हाँ
10:30 कोविद जैसा कुछ या कोई नया कानून बन जाए और आपका फैसला भयानक रूप से फेल हो जाता है। और इसके उलट कई बार कोई बिना सोचे समझे लापरवाही में लिया गया फैसला महज किस्मत के सहारे सुपर िट हो जाता है।
10:45 लेकिन अगर ऐसा है तो हम अपने फैसलों का मूल्यांकन कैसे करें? अगर रिजल्ट से पता नहीं चलेगा कि हम सही थे या गलत, तो फिर पैमाना क्या है?
10:53 पैमाना है आपकी निर्णय लेने की प्रक्रिया या प्रोसेस। अगर हम इसे बड़े परिपेक्ष से जोड़ कर देखे तो हमे रिजल्ट के बजाय इस बात का मूल्यांकन करना चाहिए कि क्या फैसला लेते समय हमारे पास जो भी जानकारी उपलब्ध थी, उसका हमने सही इस्तेमाल किया। अच्छा की हमने संभावित नुकसान का अंदाजा लगाया था। अगर खराब प्रक्रिया, ऐसी आपको अच्छा रिजल्ट मिल गया है तो वो जश्न मनाने की बात नहीं है।
11:17 क्यूँ की अगली बार किस्मत साथ नहीं देगी बिल्कुल।
11:20 लेकिन अगर आपकी प्रक्रिया सही थी और रिजल्ट खराब आया तो आपको खुद को मूर्ख नहीं समझना चाहिए।
11:26 यह बहुत जरूरी प्वाइंट है।
11:27 और यह सिद्धांत केवल बिजनेस स्टार्ट अप्स के लिए नहीं है। यह हमारे करियर, इन्वेस्टमेंट्स और आम जिंदगी पर भी लागू होता है।
11:34 हाँ, डेली लाइफ में भी।
11:36 मान लीजिये, आपने बहुत अच्छी नौकरी छोड़ कर कोई नया कोर्स करने का सोचा। आपने पूरी रिसर्च की थी। लेकिन कोर्स के बीच में ही उस इंडस्ट्री में मंदी आ गयी हो। इसका मतलब यह नही की आपका फैसला बेवकूफी भरा था, आपकी प्रोसेस सही थी, बस हवा का रुख बदल गया था।
11:54 यार ये विचार अपने आप में बहुत मुक्ति देने वाला है, है न? हाँ, ये उस गिल्ट या पछतावे को कम करता है जो हम अक्सर अपने असफल फैसलों के लिए ढोते रहते हैं। बिल्कुल अच्छा, अब इस कंपनी की कहानी में थोड़ा और आगे बढ़ते है। मान लीजिये, फाउंडर ने अपनी प्रोसेस सेट कर ली। शुरू में टीम छोटी थी, 10 पंद्रह लोग थे, फाउंडर हर चीज खुद देख
12:13 सकता था, आसान होता था।
12:15 हाँ, लेकिन जब कंपनी बड़ी होती है, जब उसमें 5000 लोग काम कर रहे होते हैं, तब तो यार 1 नया ही सर दर्द शुरू होता होगा।
12:22 लीडरशिप का दौर है, वो सबसे मुश्किल फेज होता है।
12:26 आप हर मीटिंग में नहीं बैठ सकते। आपको ऐसे लोगो को काम सौंपना पड़ता है जिनकी सोच शायद आपसे बिल्कुल अलग हो।
12:33 यही पर 1 कंपनी का असली टेस्ट होता है। अच्छा लेखिका मेगा विश्वनाथ ने लगभग 1 दशक तक स्टार्ट अप इको सिस्टम को बहुत करीब से कवर किया है।
12:42 हाँ, उनका काफी एक्सपीरियंस है।
12:43 और उन्होंने इस किताब के लिए केवल दीपिंदर गोयल के फैन्स या उनके समर्थकों के इंटरव्यू नहीं लिए। फिर किसके लिए उन्होंने उन लोगों से भी बात की जो आलोचक थे जो कंपनी छोड़ कर चले गए थे। या जिनकी सोच बिल्कुल अलग थी।
12:56 ओह, ये तो बहुत बढ़िया है।
12:57 इन सैकड़ों साक्षात्कारों से। 1 बात बहुत स्पष्ट हो कर उभरती है। 1 अच्छी कंपनी में सहमती या फिक्शन कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि ये निर्णयों के कमजोर पहलुओं को उजागर करने का सबसे बड़ा रोल है।
13:11 लेकिन 1 सेकेंड मुझे यहाँ थोड़ा डाउट है। क्या और सहमती सुनने में बहुत अच्छी लगती है। लेकिन इमेजिन कीजिये बड़े समुद्री जहाज़ को
13:18 ठीक है कर लिया।
13:19 फाउंडर उस जहाज का कप्तान है। हा, अगर उसके आस पास के नेविगेटर्स लगातार उसे टोक रहे है की सर आप जिस रास्ते पर जा रहे हैं वो गलत है, वहाँ तूफान है। तो कप्तान क्या करे? अगर वो सबकी सुनेगा तो जहाज़ कहीं पहुँच नहीं पायेगा न, इसे तो परालिसिस बाय एनालिसिस कहते हैं।
13:37 हाँ वो भी ग्रेस है।
13:38 तो जब आस पास के लोग लगातार आपके विजन पर सवाल उठा रहे हैं तो 1 लीडर ये कैसे तय करता है की उसे अपनी बात पर अड़े
13:44 रहना है, जिसे विजनरी होना कहते है।
13:47 हाँ या फिर दूसरों की मान कर अपनी राय बदलनी है। वो लाइन कहाँ ड्रा होती है।
13:52 देखिये, यही तो लीडरशिप की असली कला है। अच्छा किताब के आधार पर अगर हम इसे डिकोड करें तो 1 अच्छा लीडर वो बिल्कुल नहीं होता जो कमरे में सबसे ज्यादा बोलता है, या जो यह साबित करने में लगा रहता है की वो सबसे स्मार्ट है।
14:05 फिर कौन होता है?
14:06 1 बेहतरीन लीडर वो है जो सबसे अच्छे सवाल पूछता है। ओके, जब टीम में असहमति होती है। मान लीजिये। मार्केटिंग हेड कह रहा है की डिस्काउंट बढ़ाओ और फाइनांस हेट कहा है की इससे हम बर्बाद हो जायेंगे, जो की होता है। यह तो लीडर का काम यह नहीं है की वो किसी 1 की बात मान ले, उसका काम है उस सहमति से सही डेटा बाहर निकालना।
14:26 अच्छा मतलब दोनों साइड्स को समझना बिल्कुल।
14:29 लेखिका ने दिखाया कि कैसे 1 ही फैसले को इन्वेस्टर अलग नजरिए से देखता है, कर्मचारी अलग नजरिए से और ग्राहक अलग नजरिया रखता है।
14:36 हाँ, सबके अपने मोटिव्स होते हैं।
14:38 लीडर को इन सभी दृष्टिकोणों को 1 टेबल पर रखना होता है, सारे इनपुट लेने होते हैं और फिर 1 स्टैंड लेना होता है। और सबसे जरूरी बात उस अंतिम फैसले की पूरी जिम्मेदारी लेनी होती है। चाहे रिजल्ट कुछ भी हो, वोह मतलब
14:53 लीडरशिप कोई डिक्टेटरशिप नहीं है, बल्कि सही डेटा एक्सट्रेक्ट करने और फिर रिस्क की जिम्मेदारी लेने की क्षमता है।
15:00 एकदम सही।
15:01 अब इस पूरी कहानी का 1 और पहलू है, जिस पर मैं आना चाहती हूँ। बताइए और सच कहूँ तो ये इस चर्चा का सबसे मानवीय और शायद सबसे डार्क हिस्सा है। अच्छा हमने ग्रोथ की बात कर ली, फैसलों की बात कर ली, लीडरशिप की बात कर ली। लेकिन इस विशाल कंपनी को बनाने और उसका नेतृत्व करने का उ इंसान के व्यक्तिगत जीवन पर क्या असर पड़ता है।
15:24 ये 1 ऐसा विषय है जिसे अक्सर चमक दमक के पीछे छुपा दिया जाता
15:28 है, है, कोई इसके बारे में बात नहीं करता।
15:31 दुनिया सफलता को हमेशा बैलेंशीट्स, बैंक, अकाउंट्स, कंपनी के आकार और मैग्जीन के कवर से नापती है।
15:38 बिल्कुल।
15:40 लेकिन किताब 1 बहुत ही कड़वी सच्चाई सामने लाती है की इस पैमाने की सफलता कभी मुफ्त में नहीं आती।
15:47 इसके साथ बहुत कुछ आता है, है,
15:49 भयानक, तनाव, लगातार, अनिश्चितता और भारी व्यक्तिगत संघर्ष जुड़े होते हैं।
15:55 बिल्कुल और सोशल मीडिया के इस दौर में तो ये यार और भी खतरनाक हो गया है।
15:58 बहुत ज्यादा।
15:59 हम अकसर अपने महत्व कांक्षा को दूसरों से तुलना और दिखावे में बदल देते हैं। मुझे तो ये पूरा इको सिस्टम 1 ऐसी ट्रेडमिल की तरह लगता है जहाँ आप बस दौड़ रहे हैं और स्पीड
16:08 लगातार बढ़ती जा रही है।
16:09 हाँ, और सबसे डरावनी बात यह है कि इस ट्रेड मिल में रुकने का कोई बटन ही नहीं है। सही ऐसा लगता है की जिस मंजिल के लिए किसी इंसान ने 10 15 साल तक अपना खून पसीना 1 किया, परिवार छोड़ा नींदें खराब की उसे पाकर भी वो शांति नहीं मिलती जिसकी उसने शुरुआत में कल्पना की थी। क्यूंकि 1 लाख करोड़ की कंपनी बनने के बाद शेयर होल्डर्स की उम्मीदें और
16:32 बढ़ जाती है, बिल्कुल बढ़ जाती है।
16:34 तो इस सब का असल मतलब क्या है? क्या हम 1 ऐसी ट्रेडमिल पर भागते रहे? अगर बाहरी सफलता देखकर, किसी की नकल करना इतना खतरनाक है तो 1 आम इंसान अपनी महत्वकांक्षा को कैसे बैलेंस करे?
16:46 यह 1 बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। देखिये, महात्वकांक्षा अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है। हाँ, वो तो जरूरी है, ये इंसान को आगे बढ़ाती है। लेकिन जब महत्व कांक्षा तुलना का रूप ले लेती है तब वो ज़हर बन जाती है। हम किसी सफल इंसान का केवल फ्रंट स्टेज देखते है, उसकी गाड़ियाँ, उसकी शोहरत,
17:06 जो हमें दिखाना चाहता है।
17:07 हाँ, लेकिन हम उसका बैक स्टेज नहीं देखते। उसकी मानसिक, ऊर्जा की कीमत, उसकी एंग्जाइटी और वो सब कुछ जो उसने खोया है। सच में मंजिल पर पहुँचने के बाद भी शांति न मिलने का जो विरोधाभास या पैलेट ऑक्सन वो इसलिए पैदा होता है क्योंकि इंसान अपनी सफलता की परिभाषा दूसरों के पैमानों पर तय कर रहा होता है। वह यह चर्चा हमें ये सोचने पर मजबूर करती है की सफलता की परिभाषा हर इंसान के लिए बिल्कुल अलग
17:33 होनी चाहिए। हाँ, आपके लिए सफलता का मतलब शांति और परिवार के साथ समय बिताना हो सकता है। किसी और के लिए यह दुनिया बदलने वाला प्रोडक्ट बनाना हो सकता है। दूसरों से प्रेरणा लेना शानदार है, लेकिन उनके जीवन की कार्बन कॉपी बनने की कोशिश करना 1 बहुत बड़ी भूल है। हमें अपनी कीमत खुद तय करनी होगी की हम क्या पाने के लिए क्या
17:55 छोड़ने को तैयार है, यार ये बहुत ही गहरी बात है। हम क्या पाने के लिए क्या छोड़ने को तैयार है। है। तो अगर हम आज की इस पूरी चर्चा का निचोड़ निकाले तो हमारे सामने कुछ बहुत ही मजबूत सा बताते हैं। बिल्कुल पहला, सफलता को केवल क्लाइमैक्स या अंतिम परिणाम से मत मापिए। अपनी निर्णय लेने की प्रोसेस को सुधारने पर ध्यान दीजिये, ऐसी दूसरा रिस्क लेना जरूरी है, लेकिन हवा में तीर, चलाने और कैलकुलेटेड रिस्क के
18:23 बीच का फर्क समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है। तीसरा, अगर आप किसी टीम को लीड कर रहे हैं तो असहमतियों से डरिए मत, उनका इस्तेमाल कमजोरियों को दूर करने के लिए कीजिए बिल्कुल। और सबसे महत्वपूर्ण सफलता की अपनी 1 व्यक्तिगत परिभाषा खुद तय कीजिए, जो किसी सोशल मीडिया या समाज द्वारा थोपी गई न हो।
18:44 बहुत से ही कहा आपने और इन्ही निश्कल को समेटते हुए न मैं। 1 अंतिम विचार सामने रखना। चाहूँगा। जी, बिल्कुल 1 ऐसा सवाल जो इस किताब की कहानी ऐसी ही निकालता है, लेकिन हमें 1 बड़े परिप्रेक्ष में सोचने पर मजबूर करता है। जरा सोचिए अगर। दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे सफल कंपनियां बनाने वाले लोग भी अपनी सारी उपलब्धियों के बाद अंततः उसी मानसिक, शांति, साधारण, जीवन और व्यक्तिगत समय की तलाश
19:11 में रहते हैं, जो वो पीछे छोड़ ये थे।
19:13 हाँ, जिसे वे शुरुआत में ही कहीं बहुत पीछे छोड़ ए थे। तो क्या आधुनिक स्टार्ट इको सिस्टम में ग्रोथ का हमारा पूरा मॉडल ही उल्टा है? क्या हमें बिजनेस को बाहर से बड़ा करने की अंधी दौड़ में शामिल होने से पहले यह नहीं सीखना चाहिए की खुद को अंदर से कैसे स्थिर और शांत रखा जाए?
19:32 ओह, यह सच में 1 ऐसा सवाल है जो दिमाग में अटक जाता है। क्या सच में हम गलत दिशा में तो नहीं भाग रहे हैं? शायद किसी भी सफलता की कहानी का असली क्लाइमेक्स वो नहीं है जो बाहर दुनिया को स्क्रीन पर दिखाई देता है। बल्कि असली क्लाइमेक्स वो है जो पर्दे के पीछे सारी भीड़ के चले जाने के बाद वो इंसान अकेले में खुद से यह कह सके की वो अन्दर से शांत और संतुष्ट है।
19:58 बिल्कुल सही कहा सफलता सिर्फ मंजिल तक पहुँचने का नाम नहीं है। यह उस रफ्तार भरी सड़क पर चलते हुए खुद को खोने से बचाने का भी नाम है। है। उम्मीद है आज के इस डीप डाइव ने आपको भी अपने कुछ फैसलों और अपने महत्व कांक्षा को लेकर नए सवालों के साथ छोड़ा होगा। सोचने के लिए वाकई बहुत कुछ है।