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Yogendra Yadav ने Dharmendra Pradhan के इस्तीफ़े, CJP के भविष्य पर क्या कहा? Interview (BBC Hindi)

BBC News Hindi · 33m · transcribed Jul 2026
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Section Insights

# 0:00

Resignation of a Cabinet Minister

Did you expect a cabinet minister to resign from the Modi government so soon?

The speaker did not expect such a quick resignation from a cabinet minister, especially given the previous statements indicating that ministers do not resign in this government. They anticipated a longer delay before any resignation would occur.

  • The resignation indicates a shift in political dynamics.
  • The government is showing a willingness to act quickly to prevent further issues.
  • There was a belief that ministers would not resign easily under Modi's leadership.
# 6:45

Satisfaction with the Agreement

Are you satisfied with the recent agreement reached?

The speaker expresses dissatisfaction with the agreement, noting that some important issues were left unaddressed. They initially disagreed with the farmer's movement's leadership and believed more should have been achieved before calling it off.

  • The agreement leaves lingering concerns among activists.
  • There is a call for more comprehensive solutions in future negotiations.
  • The speaker emphasizes the importance of addressing all relevant issues.
# 13:30

Emergence of Dalit Leadership

What is the significance of Dalit leadership in current movements?

The speaker highlights that this movement is unique as it is led by Dalit leaders and aims to address broader issues beyond traditional Dalit politics, such as education and employment policies. This could signify a shift in the political landscape.

  • Dalit leadership is expanding the scope of political discourse.
  • There is a growing focus on education and employment issues.
  • New symbols and slogans are emerging from this movement.
# 20:16

Youth Participation in Movements

How is youth involvement perceived in recent movements?

The speaker notes that the youth's presence and voices were not adequately recognized during celebrations of victories. They emphasize the need for youth engagement and representation in discussions and decisions.

  • Youth voices are crucial for the legitimacy of movements.
  • There is a need for greater inclusion of young activists in leadership roles.
  • Recognition of youth contributions is essential for future success.
# 27:01

Generational Perspectives on Communication

How should different generations approach communication?

The speaker reflects on the differences in communication styles between generations, acknowledging that each generation brings its own language and symbols. They stress the importance of understanding and respecting these differences rather than judging them.

  • Each generation has its own communication style that should be respected.
  • Understanding generational differences is key to effective dialogue.
  • Older generations should not impose their standards on younger ones.

Transcript

Speaker 1

0:00 तो आज हमारे साथ मौजूद हैं पॉलिटिकल एक्टिविस्ट और वरिष्ठ विश्लेषक। योगेंद्र यादव जी, योगेंदर यादव जी, बी बी सी हिंदी में आपका बहुत बहुत स्वागत है। सबसे पहला सवाल तो आपसे यही है योगेंद्र जी की कल। धर्मेन्द्र प्रधान ने जो इस्तीफा दिया और 20 तारीख को संसद मार्च का आयोजन किया था सी जे पी ने और कल 25 तारीख थी। तो क्या आपने उम्मीद की थी कि इतनी जल्दी मोदी सरकार का कोई कैबिनेट मंत्री

Speaker 1

0:30 इस्तीफा दे सकता है, खासकर उस स्थिति में जब आपको राजनाथ सिंह का 1 बयान भी याद होगा जब उन्होंने कहा था कि यह मोदी सरकार है, ये एन डी ए की सरकार इसमें मंत्री इस्तीफा नहीं देते।

Speaker 2

0:40 मुझे कल दोपहर तक ये उम्मीद नहीं थी, मेरा अपना अनुमान था कि 34 दिन और घसीटेंगे और मेरी अपनी समझ थी कि जितना घसीटेंगे उसकी कास्ट बढ़ती चली जाएगी। तो उस लिहाज से इस सरकार ने 1 राजनैतिक समझ का परिचय दिया की अगर बात और बढ़ेगी तो अब धर्मेन्द्र जी पर नहीं, वो नरेंद्र जी तक पहुँच जाएगी। तो नरेंद्र जी को बचाने के

Speaker 2

1:10 लिए धर्मेन्द्र को छोड़ देना ही अच्छा है। लेकिन कल जो हुआ मैं समझता हूँ की वो 1 बहुत महत्वपूर्ण घड़ी थी, केवल इस लिहाज से नहीं इस्तीफा दिया और आपने सही याद दिलाया इस्तीफा कम सरकार के मंत्री से लिया गया, जिसने छाती ठोक कर कहा था हम यूपी नहीं है, हमारे यहाँ इस्तीफे नहीं होते है, उनसे इस्तीफा लेना, ये 1 छोटी बात नहीं है, ये 1 तरह से

Speaker 2

1:40 हम जिस युग में जी रहे हैं, राजनीति के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, जो मेरी नज़र में 1 तानाशाही का 1 सॉफ्ट तानाशाही का दौर है, जिसको इलेक्ट्रॉन ऑटोक्रेसी का दौर मैं कहता हूँ उस दौर में 1 लोक तंत्र का रोशनदान खुलने वाला मोमेंट है, 1 क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे लोक ने तंत्र को 1 बार दबा दिया है, अमूमन तंत्र हावी रहता है, लोग तो बेचारा दबा रहता है लेकिन लोक में कर

Speaker 2

2:10 दिया है। और कल युवाओं से मैंने कहा की भाई पहले हम इस देश में अगस्त क्रांति की बात किया करते थे, नाइनटीन फोर्टी टू को याद करते हुए, अब अगर आप इसको आगे ले जा सकते हैं तो आने वाली पीढ़ियाँ 2026 को याद करके जुलाई क्रांति की बात किया करेंगे। इतना बड़ा हुआ है, केवल 1 मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ है, 1 अहंकार का सर नीचा हुआ है और इस देश के

Speaker 2

2:41 1 पीढ़ी ने जिस पीढ़ी को नकारा बताया जाता था, जिसको बिल्कुल सेलफोन में डूबा हुआ बताया जाता था, जिसे अराजनीतिक कहा जाता था, उस पीढ़ी ने दिखा दिया की काले बाल वाले जो है सफेद बाल वालों को पॉलिटिक्स सिखा सकते हैं। उन्होंने ये दिखा दिया की इस देश के युवा वर्ग में 1 गहरा असंतोष है, बेचैनी है,

Speaker 2

3:11 उनकी भाषा अलग है, और उन्होंने यह सिखा दिया कि आगे से युवाओं से पंगा मत लेना, धर्मेंद्र

Speaker 1

3:21 प्रधान की जगह ये प्रहलाद जोशी को लेकर आये है, क्या?

Speaker 2

3:26 कहेंगे आप इस पर क्या कहा जाए जिसको ऐसा लगा होगा कि सरकार अपना कोई एजुकेशन का एजेंडा बदलने वाली है, उनको तो समझ आ गया होगा। स्पष्ट सिग्नल है कि हमारा कोई बेचारी एजेंडा नहीं बदलेगा और जो शिक्षक पर बीजेपी ने किया है, बीजेपी सरकारों ने किया है, उसमे कोई नीति का बदलाव नहीं आने वाला है। अभी की स्थिति में जो किया जाएगा। जो मेरी अपेक्षा है वो ये है

Speaker 2

3:56 की जो एग्जामिनेशन सिस्टम है। 2 तरह के एग्जामिनेशन जो की एडमिशंस के लिए होते हैं मेडिकल कॉलेज, इंजीनिरिंग कॉलेज, वगैरह के लिए और दूसरे जो रिक्रूटमेंट के लिए होते ह उनमें कुछ चुस्ती लाई जाएगी ऐसी मेरी अपेक्षा है और वो चुस्ती लाई जा सकती है। क्यूंकी वो लेफ्ट राइट का मामला नहीं है? वो शुद्ध करप्शन का मामला है, जी का मामला है, एफिसेंसी का मामला है। और मैं समझता हूँ कि सरकार को इतना सबक जरूर मिल

Speaker 2

4:24 गया है की भैया इन चीजों के अंदर चुस्ती बरतनी चाहिए। तो कुछ एफिसियंसी लाई जाएगी और कुछ प्रचार के लिए बहुत कड़े कानून लाए जायेंगे। हालाँकि इतिहास गवाह है कि कड़े कानूनों से कभी भी यह समस्या नहीं सुलझी। कड़े कानून से ड्रामा और प्रचार बहुत हो जाता है। उसके अलावा जो हमारी शिक्षा व्यवस्था में अभी जो हो रहा है, जो बुनियादी खामियां हमारी शिक्षा व्यवस्था की आज की है, जिसमे पूरी शिक्षा व्यवस्था

Speaker 2

4:54 का जो प्राइवेटाइजेशन और कमर्शियलाइजेशन हो रहा है, उसपर पहला जोशी के आने से कोई फर्क पड़ेगा कतई नहीं पड़ेगा। शिक्षा व्यवस्था में जिसको सेफनाइजेशनअंगरेजी में कई बार कह दिया जाता है की बीजेपी अपने विचार के हिसाब से उसे डाल रही है। अब मैं उसको भगवाकरण नहीं कहता हिंदी में मैं उसे नरमली घटियाकरण हता हूँ। क्यूँकि इनके आने से क्या हुआ है की शिक्षा का स्तर गिरा है, वो राइट लेफ्ट का मामला

Speaker 2

5:24 नहीं है। क्यूँकी जब लेफ्ट का डोमिनेंट हुआ करता था भारत की शिक्षा व्यवस्था से, जिसका भी मैंने कई बार विरोध किया, मगर लेफ्ट के साथ कम से कम सुविधा यह थी की उनके पास टॉप रंग इंटलेक्चुअल्स हुआ करते थे, तो वो फर्स्ट रंग, फर्स्ट, रेट इंटलेक्चुअल 10 हुआ करते थे जिसमे से किसी को वाइस वो बना सकते थे, फर्स्ट नहीं तो कभी कभार सेकेंड रंग को बना दिया करते थे। ऐसी गड़बड़ी वहाँ भी हुआ करती थी।

Speaker 2

5:50 बीजेपी की त्रासदी यह है की इनके पास थर्ड रेट से इनकी चॉइस शुरू होती है। थर्ड फोर्थ तो इसलिए यह भगवाकरण नहीं हो रहा है, यह घटिया करण हो रहा है। क्या? इसको पहला जोशी रोकेंगे कतई नहीं रोकेंगे वो पहले से भी ज्यादा करेंगे, ऐसी मेरी अपेक्षा है। इसलिए जो शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी सवाल है और रोजगार के बुनियादी सवाल हैं उनको अटेंड किया जाएगा। इसके बारे में मेरी कोई गलत फैमी नहीं है की ऐसा कुछ

Speaker 2

6:18 भी होने वाला है। इसलिए जो बड़े सवाल इस आंदोलन से खड़े हुए वो बड़े सवाल अनुत्तरित रहेंगे। और ये जिम्मेदारी इस आंदोलन पर रहेगी की अब ये छोटी चीजों को करने के बाद क्या ज्यादा बुनियादी सवालों को एड्रेस करेगी?

Speaker 1

6:36 कल धर्मेद्र प्रधान के त्याग पत्र के अलावा जो दूसरी चीज जिस पर सबकी नजर थी वो थी प्रेस कांफ्रेंस पर जब केंद्र सरकार के मंत्री इन नए नए जन्मे सी जे पी के नेताओं के साथ वो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। सवाल समझौते को लेकर भी है। क्या आप इस समझौते से संतुष्ट है? या कोई बात आपको खटकी है?

Speaker 2

6:57 कोई भी आंदोलन में, अंत में जो समझौता होता है, उसमें कुछ चीजें रह जाती है। आपको ईमानदारी से बताऊँ जब किसान आंदोलन जब कॉल ऑफ़ किया गया, मैं व्यक्तिगत रूप से उसके पक्ष में नहीं था। मैंने उस वक्त किसान आंदोलन के नेतृत्व में अपनी असहमति जताई थी। और मैंने कहा था कि नहीं 45 दिन, 1 हफ्ता और हमें खींचना चाहिए एम एस पी पर, कुछ चीज लेकर ही हमें उठना चाहिए। क्यूँकी अगर एम एस पी पर

Speaker 2

7:23 कुछ नहीं लेंगे, बाद में कुछ देने वाले नहीं वह वही, लेकिन ठीक है। कुल मिला के मैंने उसका समर्थन किया उसके साथ था। इसी तरह से कल जो समझौता हुआ है। 1 अधिक कसक रह गयी। अगर मुझसे पूछते कोई मै कौन होता हूँ बताने वाला, लेकिन अगर मुझसे पूछते तो मैं कहता भैया ये जो केसेज विड्रा करने वाली चीज है। अभी से लिखवा लो, यह मंगलवार तक जो आपने इनको समय दिया है, ये खतरनाक है। ये

Speaker 2

7:50 देखना मंगलवार को लिख के लायेंगे वो वो नहीं होगा जो आप प्रेस कॉंफ्रेंस में बोल रही हूँ। मैं आज भी आपको बोल रहा हूँ, मंगलवार नहीं हुआ है। मैं आपको आज लिख के बोल रहा हूँ की स सरकार मंगलवार को जो लिखित देगी, श्वास जो गारंटी या जो कुछ भी देगी वो वो नहीं होगा जो की प्रेस कांफ्रेंस में बोला गया था। मगर ये नेगोशिएट करना इतना आपको नहीं होता, तो इस तरह की कुछ चीजे फिसल

Speaker 2

8:17 जाती है। दूसरी चीज जो मैं चाहता था की हो की दिल्ली पुलिस ने जो किया 20 तारीख को, उसके बारे में किसी तरह की इंक्वायरी और अकाउंटेबिलिटी क्यूँकी देखिये, जो 20 तारीख को दिल्ली की सड़कों पर हुआ वो सिर्फ बेरहमी नहीं थी, बेरहमी तो थी वो सिर्फ बेशर्मी नहीं थी, बेशर्मी तो थी वो गैर कानूनी की आपको

Speaker 2

8:47 किसी कानून के तहत अधिकार नहीं है। कि जो व्यक्ति सड़क पर खड़ा है, आप पे आक्रमण नहीं कर रहा, बैरिकेड तोड़ नहीं रहा, उसपे आप लाठी चलाएं कोई अधिकार नहीं है। मैं आँखों देखि, बोल रहा हूँ। मैं खुद वहाँ खड़ा था, बेरिकेट नहीं तोड़ रहे थे, युवा में उनके बीच में था और पुलिस ने राइट अपना राइट। वेईकल इस गति से भेजा, मुझे तो लगा की हम लोगों के ऊपर से निकल जाएगा, राइट वेईकल, उसके बाद

Speaker 2

9:17 आंसू गैस, उसके बाद लाठी चार्ज, ये सब किया। नंबर 2 ऐसे डंडों का प्रयोग जिनमें कील लगी हुई है, ऐसे डंडों का प्रयोग जिसमे इलेक्ट्रिक शौक देने वाली तकनीक है। पैलेट गन्स का इस्तेमाल हुआ। अब तो बिल्कुल प्रमाणित हो चूका है, अब इसमें कोई संदेह की बात नहीं है। पैलेट इस्तेमाल किया गया और बिना वर्दी के लोगों द्वारा पुलिस के इंस्ट्रूमेंट को लेकर पुलिस के साथ मिलकर हमला करना, ये सब

Speaker 2

9:47 गैर कानूनी चीजें हैं। मेरे मन में इसकी कसक जरूर रही की अगर मैं वह एोसिएशनमें बैठा होता तो मैं जरूर कहता कि ठीक है, आप सजा आज मत दीजिये आप। 1 इंक्वायरी कमीशन तो बैठा इंक्वायरी कमीशन में जो होता है हम सब जानते हैं, लेकिन कम से कम 1 इंक्वायरी कमीशन। तो बैठाइए की 20 तारीख को क्या हुआ, क्यों हुआ, इतना गैर कानूनी चीजें क्यों हुई? तो जरुर इन चीजों की कसक रह गयी। लेकिन कोई भी

Speaker 2

10:15 आंदोलन कभी भी हर चीज़ को हासिल नहीं करता। हमेशा 1 बड़ी चीज को आप बड़ी तस्वीर को देखना चाहिए। तो अगर बड़ी तस्वीर में देखो। तो मुझे लगता है की इन युवाओं ने अनुभव हीन युवाओं ने वो हासिल किया जो हम जैसे अपने आप को बहुत समझदार मानने वाले लोग हासिल नहीं कर पाये।

Speaker 1

10:37 ये आंदोलन इस आंदोलन से जो पैदा हुए नेता हैं, जिनको आप कह रहे हैं की अभी उनमें अनुभव की थोड़ी कमी है, कहाँ देखते है उनको आने वाले समय में आप जाते हुए क्या ये राजनीतिक दल बनायेंगे या फिर किसी इतिहास में दर्ज हो जायेंगे।

Speaker 2

10:52 आज बैठके इस आंदोलन के भविष्य में भविष्यवाणी करना बहुत हल्की चीज होगी, असम्भव भी है। 23 चीजों के बारे में हम निश्चित कह सकते हैं। नंबर 1 की जो सी जे पी जी है जो पार्टी नहीं है मैं उसे पार्टी मानता, मैं उसके मन से भी कह चुका हूँ पार्टी नहीं है किसी न किसी किस्म का युवा संगठन बनेगा बनना चाहिए भी उसका 1 राजनीतिक

Speaker 2

11:22 तेवर रहेगा होना चाहिए भी उससे आगे क्या होगा कितना सफल होगा नहीं होगा। वो सौ चीजों पर निर्भर करता है जिसके बारे में अभी भी हम कुछ नहीं कह सकते। दूसरी बात हम कह सकते है की इस आंदोलन से नए नेता पैदा हुए हैं और ये मैं केवल दि के सौरव दास। और तो नही कह रहा हूँ नेहा क्या शानदार बोलती है। वो लड़की देश को ऐसे नेताओं की जरुरत है। न दिन रात लोग कहते हैं

Speaker 2

11:52 हाय हाय पॉलिटिक्स कर लेंगे, ये तो लोग अरे मैं कहता हूँ भाई इससे सुन्दर चीज क्या हो सकती है। युवा लोग राजनीति में आये, तभी तो हो सकता है देखिये कितना बड़ा पाखंड है हमारे देश में। 1 तरफ लोग कहते है ये देखो, ये इनका दादा राजनीति में था, इसके बाप राजनीति में यह राजनीति में आ गया है। डायनेस्ट लोग आ गए हैं। अच्छा भाई डायनेस्ट नहीं आने चाहिए, बिल्कुल तो कहाँ से आयेंगे? आंदोलन ऐसी आयेंगे

Speaker 2

12:21 आप आंदोलन को चाहते हो की राजनीति न करे, दूसरी तरफ आप चाहते हो, डायनेस्ट न आये तो पॉलिटिक्स में कहाँ से आयेंगे? मंगल ग्रह से आयेंगे। क्या नेता तो मेरी तो उम्मीद है की इस आंदोलन से कुछ दर्जन नेता आएंगे जो हमारे देश की राजनीति पर असर डालेंगे और मेरी खास तौर पर 2 उम्मीद है। इस युवा आंदोलन में मैंने 2 चीज देखी जो पहले के युवा आंदोलनों में नहीं देखता। 1 तो महिलाओं की संख्या

Speaker 2

12:51 बहुत ज्यादा थी, हो सकता है पचीस 30 परसेंट रही हो, पचीस 30 परसेंट को आप कम मत, मानिये सामान्य था, 5 परसेंट रहती है महिलाओं की भागीदारी, पचीस 30 परसेंट महिलाएं लड़का बिलकुल लग रहा था। सामान्य जिसे मिडल क्लास कहते हैं, उन घरों से आई हुई लड़कियां सड़क पे हाथ उठा के नारे उठा रही लग रही थी। मेरे लिए तो इससे सुन्दर कोई साइट हो नहीं सकती। उनमे से कई नेता निकालेंगी, ऐसी मेरी उम्मीद है दूसरा

Speaker 2

13:19 जो हमने लक्ष्य नहीं किया है। इस आंदोलन में दलित युवाओं की भागीदारी ज्यादा रहे, नारे भी रहे। हो सकता है इसका भी दिके स्वयं दलित होने से सम्बन्ध था। और 1 बहुत खूबसूरत पक्ष है। इससे लोगों का ध्यान नहीं गया है। क्योंकि इस देश में दलित राजनीति का मतलब है केवल एस सी एस टी के मुद्दों को उठाना, आरक्षण का, इसका उसका। ये देश का पहला बड़ा आंदोलन है, जिसका नेता दलित है, जिसका प्रेरक आदिवासी है।

Speaker 2

13:49 और जो एस सी एस टी मुद्दों पर नहीं, जो देश की एजुकेशन और एम्प्लॉयमेंट की नीति बदलना चाहता है। तो ये दूसरा पक्ष था, इसमें तो काफी दलित युवक युवतियों की भागीदारी थी। नारों में जय भीम बहुत आगे था। तो इन सबसे नया नेतृत्व उभरेगा, ऐसी मेरी उम्मीद है। इससे हमारी राजनीति की ग्रामर भी कुछ बदलेगी। हमारी राजनीति की ग्रामर जो है। बहुत बासी हो गयी।

Speaker 2

14:20 वही पुराने नारे जो जब मैं नाइनटीन टीज में, युवा संगठनों में हुआ करता था, वो नारे आज तक चले आ रहे थे। अब ये नए नारे भी बना रहे हैं, नए प्रतीक बना रहे हैं। राजनीति की थोड़ी सफाई हो। हर आंदोलन राजनीति की काई को थोड़ा सा दूर कर देता है। थोड़ा उसकी सफाई करता है, वो सब हो रहा है। मेरे लिए सब बहुत अच्छे लक्षण है। भविष्यवाणी इसकी मैं नहीं कर सकता। लेकिन जो होगा, जो

Speaker 2

14:48 आज है, उससे बेहतर होगा। और ये जो देश में ये जो डर छा गया था, पिछले 12 साल से यह दर टूटे वो जो रणवीर साह की कविता है, न और कुछ टूटे न। टूटे मेरे अन्दर का कायर टूटेगा बस, वो तो टूटेगा न। यह बहुत बड़ी बात है।

Speaker 1

15:10 सोनम वांगचुक को लेकर। बहुत इस बीच में सवाल उठे। खासकर जब उन्होंने अनशन तोड़ा और फिर 1 दिन पहले जब सोशल मीडिया पर उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठे, थोड़ी सी हताशा में उन्होंने टिप्पणी भी की, उनकी पत्नी की भी, गीतांजली की भी। 1 टिप्पणी काफी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। जिसमें विश्व गुरु, सनातन धर्म जैसे शब्दों को जोड़ने की बात है। क्या देखते हैं आप? अनशन तोड़ने के पहले के सोनम वांगचुक

Speaker 1

15:38 और अनशन तोड़ने के समय केंद्रीय केंद्रीय मंत्रियों की उपस्थिति में उनका अनशन तोड़ना क्या सवाल उन पर उठ रहे? सवाल जायज है या लोग जरूर से

Speaker 2

15:48 ज्यादा घेर रहे है, उनको उनकी जितनी बड़ी भूमिका थी, उसके साथ उतना न्याय नहीं हुआ। राजनीति में हमेशा जो बहुत महत्वपूर्ण फिगर होते है, वो थोड़ा एमबी गोस होते है, और उनकी एमबीग्युइटीमतलब, उनका 1 क्या कहना चाहिए? एमबीग्यूटीमतलब थोड़ा सा अस्पष्टता जो है, वही उनको वहाँ पहुँचती है, जहाँ वो अगर वो बिल्कुल स्पष्ट हो तो वो वहाँ होंगे नहीं, जहाँ

Speaker 2

16:18 है तो सोनम वांगचुक उन कैरेक्टर्स में से 1 पहली बात जो एकनॉलेज की जानी चाहिए। वो ये कि ये धरना सोनम वाचक के पास से पहले शुरू हुआ था। इसको लगभग कोई अटेंशन नहीं मिला। इस प्रोटेस्ट को सोनम वांगचुक के बैठने से इसमें 1 खास तरह की गंभीरता आई। इसको देश ने ध्यान दिया और सोनम वांचो के

Speaker 2

16:48 पंद्रह दिन का अंश पूरा होने के बाद इसके लिए सिंपली पैदा हुआ। तो सोनम इस आंदोलन की सफलता में सोनम 1 बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं, 1 बिल्कुल केंद्रीय भूमिका है की अगर उनका पास्ट नहीं होता तो ये आंदोलन इस मुकाम तक नहीं पहुँचता। इसके बारे में कोई 2 राय नहीं। नंबर 2

Speaker 2

17:19 सोन क्यूंकि दिल्ली में बहुत कांस्प्रेसी थ्योरी चलती रहती है, दिल्ली कांस्प्रेसी का शहर तो हर वक्त, हर समय, हर समझदार आदमी 3 कांस्पिरेसी थ्योरी अपनी जेब में रखता है। और मुझे भी बार बार सुननी पड़ती है। तो सुनता रहता हूँ। मैं इन तमाम चीजों को सोन वान चुक कहीं? अगर वो कॉंस्पिरेसथ्यूरी सही होती है तो सोनम वांगचुक के पास 4 या 5 अवसर थे जो वो आसानी से समझौता कर सकते थे। समझौता करके चुपचाप ऐसे

Speaker 2

17:49 चले जाते, धर्मेंद प्रधान की कुर्सी बच जाती, सरकार की फजीहत नहीं मगर, ऐसा उन्होंने नहीं किया। सोनम चुप चाहते। तो जब उनको सरकार अस्पताल ले गयी, उसके बाद स्पीड ले लेते। सरकार तो स्पीड कर ही रही थी। अनशन करने की उन्हें कोई जरूरत नहीं थी। उन्होंने अनशन को कंटिन्यू किया, इन सब बातों को दर्ज किया जाना चाहिए। जिस तरह से अंत में वो फास्ट पूरा हुआ, मैंने सोमवार की पूरी 24

Speaker 2

18:19 मिनट की वीडियो देखी तो उन्होंने एक्सप्लेन किया। वो कई बातें बताती हैं। यह अभी भी मुझे स्पष्ट नहीं हो पाया कि गिलास मंत्री के हाथ से लेने की क्या जरुरत। मुझे स्पष्ट नहीं हो पाया। किसी बच्चे के हाथ से ले लेते, अपनी पत्नी के हाथ से ले लेते। आप वो जो लद्दाख के नेता थे, उनके हाथ से ले लेते, नर्स के हाथ से ले लेते। मंत्री के हाथ से लिया ये 1 राजनीतिक समझ की कमजोरी। अब

Speaker 2

18:45 वो 1 राजनीतिक प्राणी नहीं है। तो इसे मैं मानता हूँ। जैसे 20 तारीख को सौरव दास और संतोष का जब बाहर सड़क पे बच्चों की पिटाई हो रही है, वो मंत्री के साथ ड्राइंग रूम में बैठे है, उसकी तस्वीर जा ही रहे है। पोलिटिकल अंडरस्टैंडिंग की भूल, जिसको उन्होंने बाद में ठीक कर लिया। दोनों ने बाद में उन्होंने अगले दोनों राउंड में उसको अपनी गलती को ठीक कर दिया। सोनम की तरफ से ये 1, ये 1

Speaker 2

19:14 जजमेंट की एरर थी। इस में कोई सन्देह नहीं है। दूसरा मुझे ये बात समझ नहीं आई कि जब वो 20 दिन तक जिन लोगों के साथ आप मंच पर बैठे हैं, जिनके पक्ष में आप उपवास कर रहे हैं, उनकी राय के बिना आप कोई चीज स्वीकार कैसे कर? सके? सोनो मंचों का अंश पूरा होना चाहिए था। मैं इसके पक्ष में था। मैं तो चाहता था 20 तारीख को ही पूरा कर ले।

Speaker 2

19:44 क्यूंकि जितना उन्होंने किया, वो 1 मानवीय क्षमता से ज्यादा था, जो उन्होंने किया। 20 दिन के बाद अनशन किसी भी तरह से रुकना चाहिए था। मैं इसके पक्ष में था। तो मैं कतई नहीं कहूंगा की आपने अपना उपवास और क्यूँ न बढ़ाया। ये तो कहना होगा की आपने अपनी जान क्यों न खत्म कर ली। मैं बिलकुल ऐसी बात नहीं कहता। लेकिन अगर वो करते वक्त कुछ राजनीतिक समझदारी दिखाई जाती तो उससे सोना बच्चों का कद और

Speaker 2

20:12 बड़ा होता। कल जब कि आंदोलन का पूरा होने जीत का जश्न बन रहा था, सोनम बचों का चेहरा उतना प्रोमिनेंट वहाँ नहीं था जितना होना चाहिए था। और वो इसी वजह से ये 3 चीज जो 1 मंत्री के गिलास से मंत्री के हाथ से लेना। जिस मंत्री ने तब तक वो बातें स्वीकार नहीं की, दूसरा बातचीत में उन युवाओं को शामिल नहीं करना जिनके लिए अनशन

Speaker 2

20:42 हो रहा था। और तीसरा उनकी पत्नी गीतांजलि जी द्वारा जो टी वी पर कुछ बयान दिए गए, सनातन धर्म कहने से मुझे कोई तराज नहीं है। लेकिन उन्होंने टारगेट करके ओपोजिशन के बारे में कुछ बोला। यह सब कहने की कोई आवश्यकता नहीं। तो ये सब काम का, उस कांस्पेट थ्योरीज वगैरह को बढ़ाने वाली बात है। लेकिन ये सब कहने के बावजूद मेरे मन में सोन वान चोक के प्रति कृतज्ञता का भाव है की उन्होंने इस युवाओं

Speaker 2

21:12 की आवाज को जो कहीं लार खाने में तूती की तरह डूब जाती। सोनम वांगचुक ने अपनी हिम्मत से उस आवाज़ को 1 शिखर पर पहुँचाया। मैंने मंच से कहा था, मैं आज भी इस बात पर कायम हूँ कि सोनम 1 दूसरी मिट्टी का बना हुआ आदमी है, भूल हुई है कुछ चीजों में जरूर वो भी सीखेंगे। और देखिये 20 दिन खाना न खाने के बाद आप और मैं कितनी समझदारी से काम लेंगे, इसका हम इस वक्त

Speaker 2

21:42 हम आराम से बैठे टीवी पर बात कर रहे हैं। 20 दिन न खाने के बाद आप और मैं किस भाषा में बोलेंगे उसका हम क्या गारंटी दे सकते है। तो यहीं पर इस प्रखंड को समाप्त।

Speaker 1

21:52 विपक्ष की भूमिका को आप कैसे देखते हैं? और दूसरा 1 तरह से ज। आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को टारगेट किया। इस पूरे आंदोलन के बीचों बीच में जब आंदोलन एकदम शिखर पर था, आंदोलन तेज था, देश भर में प्रदर्शन हो रहे थे, उस बीच में केजरीवाल की पार्टी का कांग्रेस को टारगेट करना, आंदोलन

Speaker 2

22:11 और विपक्ष का, दोनों का डिविजन फ्लेवर होता है। हमेशा दुनिया में आंदोलन का काम है, मुद्दों को ज़मीन से लेके, संस्थान के दरवाजे तक ला और विपक्ष का काम है संस्थान के दरवाजे खोल के मुद्दों को अंदर ले के जाए

Speaker 1

22:26 छोटी।

Speaker 2

22:26 मोटी बातों को अगर आप छोड़ दे तो कुल मिला के इस आंदोलन में वही हुआ। इन्होंने उठाया विपक्ष ने जा के उस दरवाजे को खटकाया और उसको दरवाजे को खोला। तो ये तो बड़ी तस्वीर है। अच्छा हुआ। अच्छा हुआ की इन्होंने आंदोलन ने अपने दरवाजे तमाम विपक्ष के लिए खोले। अच्छा हुआ की कमोबेश सभी विपक्ष दलों के नेता वहाँ पर पहुँचे।

Speaker 2

22:57 अच्छा हुआ की जब युवाओं पे लाठी चली, उसके बाद अरविन्द केजरीवाल पुलिस कमिश्नर के ऑफिस में पहुंचे और उन्होंने एफआईआर मांगे। अच्छा हुआ कि राहुल गांधी प्राइम मिनिस्टर के घर के बाहर खड़े होकर राहुल गांधी ने भी वो झेला जो की विद्यार्थियों ने झेला था। सड़को पे तो किसी को लगा तो होगा न। अच्छा विपक्ष नेता के साथ को भी ऐसे घसीटा जा रहा है। अगर यह विपक्ष न करता ऐसा तो मैं कहता कि कैसा निकम्मा

Speaker 2

23:27 विपक्ष है। तो हुआ कुल मिला के। अब छोटी बारीक बातें जो आपने कुछ ही क्या। आर जे डी को उपस्थित आर जे डी की उपस्थिति होनी चाहिए थी। मैंने इतना नोटिस नहीं किया, लेकिन सपा की उपस्थिति तो मुझे दिख रही थी, मुझे आर जे डी की उपस्थिति दिखाई नहीं, और जो नहीं दिए, दिखाई दिए, वो कुछ हद तक छोटे हुए, जो चीज अवॉइड की जा सकती थी, वो ये था वो जो पब्लिक में जो तूतू हुई,

Speaker 2

23:57 और मैं विशेष तौर पर जो संजय सिंह जी और आतिशी का जो बयान था, वो पढ़ के, और बाद में शायद इन्होंने सौरभ भारद्वाज ने भी ये सब किया। ये पढ़ के मुझे लगा की भाई आप ने पंजाब में इलेक्शन लड़ना है, कांग्रेस से आपको इलेक्शन लड़ना है, पंजाब में जाकर लड़ो क्यों लड़ रहे हो इलेक्शन। और ये कहना जैसा। और ये जो कांस्पीरेसी थ्योरी चलाई गयी, वो तो इतनी हास्य मुझे समझ नहीं आ रहा था।

Speaker 2

24:25 आम आदमी पार्टी वाले, ये संजय सिंह संजीदा, इंसान मानता हूँ, आम तौर पे अच्छा भाषण देते हैं। मतलब जैसा व्यक्ति कह रहा है। आप देखिये तो मतलब मोदी जी की राहुल गाँधी से सेटिंग हो गयी की तुम चुपचाप से मेरे घर आ जाना, मैं तुम्हें अलाव करूंगा, तुम वहाँ जा के प्रदर्शन करना, फिर मैं तुम्हारी खूब पिटाई करवाऊंगा और उसके बाद तुम्हें बस में ठोस दूंगा, जिससे

Speaker 2

24:56 तुम्हारी राजनीति चमक जाएगी, जिससे मुझे फायदा हो जाएगा। ने पांचवी क्लास का बच्चा भी इसमें विश्वास करेगा की अंकल क्या बात कह रहे हो, थोड़ा सा अंकल पानी पी लो, थोड़ा सा बैठ जाओ इस तरह की बातें करना। तो मतलब ये मुझे लगा कि पंजाब के चुनाव की जो 1 खींचातानी है, जो स्वाभाविक है, जो स्वस्थ भी है, उसको दिल्ली में लाना और इस तरह से लाना। उसने इन नेताओं के कद को कुछ

Speaker 1

25:25 कम किया, क्या आपने जी के आंदोलन में कुछ खास महसूस किया ऐसा, लेकिन साथ में उनकी आलोचना भी हो रही है, उनकी भाषा को लेकर, उनकी लैंग्वेज को लेकर। तो कहा देखते हैं इन सबको आप।

Speaker 2

25:37 मेरी अपनी भूमिका बहुत ही सीमित थी, जो फिल्मों में कहते है। गेस्ट आर्टिस्ट कभी चले गए। जा के बस। ये जरूर था की जब आंदोलन शुरू हुआ तो हमारे तमाम मुझे जैसे बुजुर्ग दोस्तों की बड़ी बड़ी कस्पसथिथीकसीजेपी जो है, ये बीजेपी का इंस्पायर्ड चीज है। तो मैं उन्हें कहा करता था, ऐसी सब बातें मत करो। और मैं जा के कम से कम पहले दिन से, जिस दिन ये इनका ट्विटर बंद किया गया था,

Speaker 2

26:07 अमेरिका में थे। कुछ नम्बर दिन मैंने समर्थन किया, जिस दिन अभी के दिल्ली में आये, मैं तो दिल्ली में नहीं था, लेकिन मैंने विनोद कुमार शुक्ल की कविता पढ़ के उनका समर्थन किया और जब जमीन पर शुरू हुआ इनका धरना तो मैंने जाके उसका किया। स्कूल मिला के हौसला बढ़ाया और मैं क्या कर सकता था। युवाओं का आंदोलन था, उनके निर्णय थे और जैसा। मैंने शुरू में ही कहा की भाई इन काले बाल वालों ने सफेद

Speaker 2

26:33 बाल वालों को पॉलिटिक्स सिखा दी। मैं कुछ समय से 1 बात कह रहा हूँ, पंकज जी जो हमारे साथी कई बार मानते नहीं थे, क्यूँ की हम लोगो का 1 मुहावरा सा बन गया। और ये जो नई जेनरेशन है, ये लोग तो ये लोग नॉन सीरियस है, ये तो सारा समय रील देखते रहते हैं, ये तो बिल्कुल क्यूँकी दिक्कत होती है की हर जनरेशन चाहती हैं की नई जनरेशन मेरे मुहावरे में आके, बोले, मेरे मुहावरे में

Speaker 2

27:03 बोलोगे तो मैं गंभीर मानूंगा, किसी दुसरे मुहावरे में बोलोगे तो तुम और जो करना चाहिए तो सफेद बाल वालों की जिम्मेदारी बनती है। अगर हमे कुछ भी दुनिया का अनुभव है तो उस अनुभव का 1 हिस्सा होना चाहिए की हर पीढ़ी अपनी ग्रैमर लेके आती है, अपने प्रतीक लेके आती है। अब वो रैप करते हैं, रैप मेरे तो पल्ले नहीं पड़ता, मैं तो कहता हूँ भैया मेल को लिख के दे। 2 मैं पढूंगा और मेरे बच्चे

Speaker 2

27:33 रैप करते हैं, मैं कहता हूँ के दे 2 मैं पढ़ लूंगा, मैं सुन तो नहीं सकता, मुझे तो समझ नहीं आता, मगर मेरा दोष है उनका दोष नहीं। हर पीढ़ी की अपनी ग्रैमर ये मीम लेके आते हैं। मुझे मीम की भाषा पसंद नहीं है। मैं आज भी सुबह अखबार पढ़ता हूँ, मैं देखना पसंद नहीं करता, वीडियो देखना पसंद नहीं करता। लेकिन ये सब मेरी समस्या, यह उनकी समस्या नहीं है। मैं अपनी पीढ़ी के पैमानों से नई

Speaker 2

28:01 पीढ़ी को जज नहीं कर सकता और नहीं करना चाहिए। इस आंदोलन में। सिखाया है। इस आंदोलन ने सिखाया है की ये मीम बनाने वाले लोग ज्यादा घातक होते हैं। कई बार वो जो होता है न छोटा, सा जो काटा है, वो छोटा तीर, कई बार ज्यादा गंभीर वार कर सकता है। जैसा कबीर ने हमें बताया था। दुनिया का इतिहास बताता है की अथॉरिटेरियन रिजीम्स के सामने पुराने तरह के आंदोलन

Speaker 2

28:31 सफल नहीं हो पाते और वहाँ मीन चुटकला व्यंग कविता या सफल हो पाती है। अगर पुराने जवानों की बात करे तो 1 बाला हम देखेंगे वो 1 गीत जिया के मिलिटरी डिक्टेटरशिप में के कवच में ज्यादा बड़ा छेद करता है। बजाय की सड़क पर चलने वाली रैलियों के तो हमें सीखना होगा। राजनीति की भाषा

Speaker 2

29:01 बदल रही है, राजनीति के प्रतीक बदल रहे हैं और हमें बदलने की जरूरत है। यह कम से कम मैंने सीखा, सर झुका के सीखा और आज भी सर झुका कर। मैं आपको 1 और उदाहरण बता सकता हूँ। 20 तारीख से 4 या 5 दिन पहले मेरी भी दीपक और उनके साथियों से बात हो रही थी, वो कह रहे थे कि ऐसा लग रहा है की पंद्रह 20 हजार लोग आ जायेंगे, शायद 7 दिन पहले की बात

Speaker 2

29:25 है, मैंने हंस के कहा नहीं बेटा पंद्रह। 20 कहने की बात होती है, डेढ़ 2000 आते हैं, बाकी तो लोग आते नहीं है, लाये जाते तो यह मेरा पुराना अहंकार बोल रहा था, मेरी पीढ़ी की समझ बोल रही थी, उससे 20 तारीख से 2 दिन पहले मैंने हाथ जोड़ के की। मैं बिल्कुल गलत था। मुझे लग रहा है की 20 पचीस हजार आ जायेंगे, लेकिन जो आये उससे बहुत ज्यादा थे। तो मतलब हमे, हमारा अहंकार छोड़

Speaker 2

29:53 के, हमें इनकी नई भाषा, नए तौर, तरीके, अंदाज सीखने होंगे। तो कल। जब मैं गया वहाँ तो तमाम मीडिया वालों ने कहा नई पीढ़ी के लिए क्या सन्देश है? मैंने कहा उन्होंने हमें सन्देश दिया, मैं उन्हें क्या संदेश दूंगा। बस सर झुका के सीखेंगे। और उन्होंने पूरे देश को सन्देश दिया है की नई पीढ़ी के का में गहरा असंतोष है, गुस्सा है। और उन्होंने

Speaker 2

30:25 इस देश के राजनीतिक तंत्र को, पूरे तंत्र को यह मैसेज दिया है। हमसे पंगा नहीं लेता, यह बहुत बड़ी बात है।

Speaker 1

30:34 1 चीज जो योगेंद्र यादव ने जन जी से सीखी हो, जो हमेशा वो याद रखेंगे और अगले कभी आंदोलन की जरुरत पड़ी तो उसका इस्तेमाल भी करेंगे।

Speaker 2

30:43 1 नहीं मैंने तो बहुत चीजें सीखी है। भाई इस बात को नए नए नारे सीखे हैं। जैसे मेरे जमाने का नारा होता था जब जब, जो भी शासक दल होता था, उसका जब जब सत्ता डरती है, पुलिस को आगे करती है। हर नारे का 1 नया स्वरुप इन्होंने दिया है, नए नारे सीखे हैं। और दूसरा ये की प्रोटेस्ट में हंसी, खेल, डांस, ये सब उसका हिस्सा है। प्रोटेस्ट को इतना गंभीर मुंह लटका कर नहीं करना चाहिए।

Speaker 2

31:13 और मोह जो न लटकाए उसको गंभीर नहीं समझना चाहिए। ये सीखा और और ये सीखा की भारत सिर्फ वो नहीं है जो दिल्ली के ड्राइंग रूम या टीवी स्टूडियो में बैठ के गंभीर चर्चाओं में दिखाई देता है। जितना निराशा नैराश्य बहुत होता है। हाय हाय, देश तो डूब गया, लुट गए, मर गए, कब्जा हो गया। हर चीज पे कुछ नहीं बचा। यह नहीं है। यह देश में बहुत कुछ

Speaker 2

31:43 है। मैं तो उसको सलाम करता हूँ।

Speaker 1

31:45 आपके पिछले इंटरव्यू के 1 क्लिप को बीजेपी के आईटी सेल और कई राइट विंगर ने सोशल मीडिया पर डाला। जिसमें आपको ये कहते सुनाया जा रहा है कि देश के भविष्य का फैसला या संसद में नहीं सड़कों पर होगा। इस पर कुछ आप स्पष्टीकरण देना चाहेंगे कि किस सवाल के जवाब में आपने

Speaker 2

32:05 कहा क्या था ने स्पष्टीकरण क्यों दी। मैं तो सब बात को दोहराना चाहता हूँ। क्यूंकी बहुत सोच समझ के मैं कह रहा हूँ, वो क्या होता है। वो थोड़ा हमेशा की तरह बदमाशी करते हैं। उसका 1 हिस्सा जो कहता है, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण। पूर्ण आंदोलन लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण शब्द को बाद में डिलीट कर देते हैं। यह खेल वो हमेशा बदमाशी करते है। लेकिन देखिये गंभीर बात है जो मैंने हमेशा कहा है। संसद और सड़क का 1

Speaker 2

32:34 अंतरंग रिश्ता है। दुनिया भर में लोकतंत्र, अच्छा और आदर्श। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता। हमेशा मूवमेंट की उसमे 1 भूमिका होती है, सपोर्टिव भूमिका होती है। पूरी। दुनिया में, भारत जैसे देश में वो केवल सपोर्टिव नहीं, सप्लीमेंटरी भूमिका होती है। क्यूँकि हमारी संस्थाएं हमेशा कमजोर रही है और ये केवल बी जे पी की बात नहीं कर रहा हूँ। पिचहत्तर साल

Speaker 2

33:04 में इस देश की संस्थागत ढांचा कमजोर रहा है। इसलिए लोकतंत्र को टिकाए रखने का काम हमेशा सड़क के आंदोलनों ने किया है। लोकतंत्र को जिंदा रखेंगे, सड़कें, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से मेरे ख्याल में हमें रावण और लोहिया को याद करना चाहिए। क्यू की प्रधानमंत्री भी उन्हें याद करने में कभी कभी विश्वास करते है की जब सड़कें सूनी बढ़ जाती है तो संसद आवारा हो जाती

Speaker 2

33:34 है और मैं सलाम करना चाहता हूँ इस आंदोलन को सलाम करना चाहता हूँ इस देश के युवाओं को कि उन्होंने सडकों को आबाद किया।

Summary

योगेंद्र यादव ने हाल ही में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और युवा आंदोलनों की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह इस्तीफा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षण है, जो दर्शाता है कि युवा वर्ग में असंतोष बढ़ रहा है और वे अब सत्ता के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। यादव ने यह भी कहा कि इस आंदोलन से नए नेता उभरेंगे और यह राजनीति की दिशा को बदलने में मदद करेगा।

- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मोदी सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षण है।
- युवा वर्ग ने दिखाया है कि वे सत्ता के खिलाफ खड़े हो सकते हैं, जो एक नई राजनीतिक चेतना का संकेत है।
- आंदोलन में महिलाओं और दलितों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है, जो नए नेतृत्व के उभरने का संकेत है।
- यादव ने कहा कि आंदोलन ने शिक्षा और रोजगार के मुद्दों को उठाया है, लेकिन बुनियादी सवालों का समाधान अभी बाकी है।
- सोनम वांगचुक की भूमिका को सराहा गया, लेकिन उनकी कुछ राजनीतिक निर्णयों पर सवाल उठाए गए।
- विपक्ष ने आंदोलन का समर्थन किया, जिससे मुद्दों को संस्थानों के दरवाजे तक पहुँचाने में मदद मिली।
- यादव ने कहा कि युवा आंदोलनों में हंसी और खेल का होना जरूरी है, जिससे वे गंभीरता से नहीं बल्कि उत्साह से जुड़े रहें।
- उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र को सड़कों पर आंदोलनों द्वारा जीवित रखा जाता है, जो संस्थाओं की कमजोरी के बावजूद आवश्यक है।

Questions Answered

Did you expect a cabinet minister to resign from the Modi government so soon?

The speaker did not expect such a quick resignation from a cabinet minister, especially given the previous statements indicating that ministers do not resign in this government. They anticipated a longer delay before any resignation would occur.

Are you satisfied with the recent agreement reached?

The speaker expresses dissatisfaction with the agreement, noting that some important issues were left unaddressed. They initially disagreed with the farmer's movement's leadership and believed more should have been achieved before calling it off.

What is the significance of Dalit leadership in current movements?

The speaker highlights that this movement is unique as it is led by Dalit leaders and aims to address broader issues beyond traditional Dalit politics, such as education and employment policies. This could signify a shift in the political landscape.

How is youth involvement perceived in recent movements?

The speaker notes that the youth's presence and voices were not adequately recognized during celebrations of victories. They emphasize the need for youth engagement and representation in discussions and decisions.

How should different generations approach communication?

The speaker reflects on the differences in communication styles between generations, acknowledging that each generation brings its own language and symbols. They stress the importance of understanding and respecting these differences rather than judging them.

© transcribe · For agents Built with care and craft by Gokul Rajaram